जिहीते साम्राज्यं जगति नवलावण्यलहरी
परीपाकस्यान्तर्मुदितमदनावेशमधुरम् ।
नटद्भ्रूवल्लीकं स्मितनवसुधाकेलिसदनं
स्फुरन्मुक्तापङ्क्तिप्रतिमरदनं यस्य वदनम् ॥
जिहीते साम्राज्यं जगति नवलावण्यलहरी
परीपाकस्यान्तर्मुदितमदनावेशमधुरम् ।
नटद्भ्रूवल्लीकं स्मितनवसुधाकेलिसदनं
स्फुरन्मुक्तापङ्क्तिप्रतिमरदनं यस्य वदनम् ॥
परीपाकस्यान्तर्मुदितमदनावेशमधुरम् ।
नटद्भ्रूवल्लीकं स्मितनवसुधाकेलिसदनं
स्फुरन्मुक्तापङ्क्तिप्रतिमरदनं यस्य वदनम् ॥
अन्वयः
AI
यस्य वदनं जगति साम्राज्यं जिहीते, नव-लावण्य-लहरी-परीपाकस्य अन्तः मुदित-मदन-आवेश-मधुरम्, नटत्-भ्रू-वल्लीकम्, स्मित-नव-सुधा-केलि-सदनम्, स्फुरत्-मुक्ता-पङ्क्ति-प्रतिम-रदनम् (अस्ति)।
Summary
AI
Whose face rules supreme in the world, sweetened by the maturing waves of fresh beauty and the inner joy of Cupid's influence; it features dancing creeper-like eyebrows, acts as a playground for the nectar of fresh smiles, and possesses teeth resembling rows of shimmering pearls.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| जि | ही | ते | सा | म्रा | ज्यं | ज | ग | ति | न | व | ला | व | ण्य | ल | ह | री |
| प | री | पा | क | स्या | न्त | र्मु | दि | त | म | द | ना | वे | श | म | धु | रम् |
| न | ट | द्भ्रू | व | ल्ली | कं | स्मि | त | न | व | सु | धा | के | लि | स | द | नं |
| स्फु | र | न्मु | क्ता | प | ङ्क्ति | प्र | ति | म | र | द | नं | य | स्य | व | द | नम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.