तृणावर्तारातेर्विरहदवसन्तापिततनोः
सदाभीरीवृन्दप्रणयबहुमानोन्नतिविदः ।
विधातव्यो नव्यस्तवकभरसंवर्धितशुचस्
त्वया वृन्दादेव्याः परमविनयाद्वन्दनविधिः ॥
तृणावर्तारातेर्विरहदवसन्तापिततनोः
सदाभीरीवृन्दप्रणयबहुमानोन्नतिविदः ।
विधातव्यो नव्यस्तवकभरसंवर्धितशुचस्
त्वया वृन्दादेव्याः परमविनयाद्वन्दनविधिः ॥
सदाभीरीवृन्दप्रणयबहुमानोन्नतिविदः ।
विधातव्यो नव्यस्तवकभरसंवर्धितशुचस्
त्वया वृन्दादेव्याः परमविनयाद्वन्दनविधिः ॥
अन्वयः
AI
तृणावर्त-अरातेः विरह-दव-सन्तापित-तनोः सदा-आभीरी-वृन्द-प्रणय-बहु-मान-उन्नति-विदः नव्य-स्तबक-भर-संवर्धित-शुचः वृन्दा-देव्याः त्वया परम-विनयात् वन्दन-विधिः विधातव्यः ॥
Summary
AI
You must offer respectful salutations with great humility to the goddess *Vṛndā*. Her body is scorched by the forest fire of separation from the enemy of *Tṛṇāvarta*, and her grief is intensified by the weight of fresh blossoms, yet she knows the height of the love and honor of the cowherd women.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| तृ | णा | व | र्ता | रा | ते | र्वि | र | ह | द | व | स | न्ता | पि | त | त | नोः |
| स | दा | भी | री | वृ | न्द | प्र | ण | य | ब | हु | मा | नो | न्न | ति | वि | दः |
| वि | धा | त | व्यो | न | व्य | स्त | व | क | भ | र | सं | व | र्धि | त | शु | च |
| स्त्व | या | वृ | न्दा | दे | व्याः | प | र | म | वि | न | या | द्व | न्द | न | वि | धिः |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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