उदञ्चन्नेत्राम्भःप्रसरलहरीपिच्छिलपथ-
स्खलत्पादन्यासप्रणिहितविलम्बाकुलधियः ।
हरौ यस्मिन् मग्ने त्वरितयमुनाकुलगमन-
स्पृहाक्षिप्ता गोप्यो ययुरनुपदं कामपि दशाम् ॥
उदञ्चन्नेत्राम्भःप्रसरलहरीपिच्छिलपथ-
स्खलत्पादन्यासप्रणिहितविलम्बाकुलधियः ।
हरौ यस्मिन् मग्ने त्वरितयमुनाकुलगमन-
स्पृहाक्षिप्ता गोप्यो ययुरनुपदं कामपि दशाम् ॥
स्खलत्पादन्यासप्रणिहितविलम्बाकुलधियः ।
हरौ यस्मिन् मग्ने त्वरितयमुनाकुलगमन-
स्पृहाक्षिप्ता गोप्यो ययुरनुपदं कामपि दशाम् ॥
अन्वयः
AI
यस्मिन् हरौ मग्ने उदञ्चत्-नेत्र-अम्भः-प्रसर-लहरी-पिच्छिल-पथ-स्खलत्-पाद-न्यास-प्रणिहित-विलम्ब-आकुल-धियः त्वरित-यमुना-कूल-गमन-स्पृहा-क्षिप्ताः गोप्यः अनुपदं कामपि दशाम् ययुः ॥
Summary
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When *Hari* submerged into the water, the *Gopīs* were overwhelmed by a strange state. Their path became slippery from the waves of tears flowing from their eyes, and though desperate to reach the banks of the *Yamunā* quickly, their stumbling steps caused an agonizing delay.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | द | ञ्च | न्ने | त्रा | म्भः | प्र | स | र | ल | ह | री | पि | च्छि | ल | प | थ |
| स्ख | ल | त्पा | द | न्या | स | प्र | णि | हि | त | वि | ल | म्बा | कु | ल | धि | यः |
| ह | रौ | य | स्मि | न्म | ग्ने | त्व | रि | त | य | मु | ना | कु | ल | ग | म | न |
| स्पृ | हा | क्षि | प्ता | गो | प्यो | य | यु | र | नु | प | दं | का | म | पि | द | शाम् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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