त्वमासीनः शाखान्तरमिलितचण्डत्विषि सुखं
दधीथा भाण्डीरे क्षणमपि घनश्यामलरुचौ ।
ततो हंसं बिभ्रन्निखिलनभसश्चित्रमिषया
स वर्धिष्णुं विष्णुं कलितदरचक्रं तुलयिता ॥
त्वमासीनः शाखान्तरमिलितचण्डत्विषि सुखं
दधीथा भाण्डीरे क्षणमपि घनश्यामलरुचौ ।
ततो हंसं बिभ्रन्निखिलनभसश्चित्रमिषया
स वर्धिष्णुं विष्णुं कलितदरचक्रं तुलयिता ॥
दधीथा भाण्डीरे क्षणमपि घनश्यामलरुचौ ।
ततो हंसं बिभ्रन्निखिलनभसश्चित्रमिषया
स वर्धिष्णुं विष्णुं कलितदरचक्रं तुलयिता ॥
अन्वयः
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त्वम् शाखा-अन्तर-मिलित-चण्ड-त्विषि घन-श्याम-रुचौ भाण्डीरे क्षणम् अपि सुखम् आसीनः दधीथा । ततः निखिल-नभसः चित्र-मिषया हंसं बिभ्रत् सः वर्धिष्णुं विष्णुं कलित-दर-चक्रं तुलयिता ॥
Summary
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Resting comfortably for a moment in the *Bhāṇḍीra* tree, whose dark green foliage filters the fierce sunlight, you will resemble *Viṣṇu* Himself. As you carry the form of a swan (*Haṃsa*) against the sky, you will look like the expanding Lord holding His conch and discus.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्व | मा | सी | नः | शा | खा | न्त | र | मि | लि | त | च | ण्ड | त्वि | षि | सु | खं |
| द | धी | था | भा | ण्डी | रे | क्ष | ण | म | पि | घ | न | श्या | म | ल | रु | चौ |
| त | तो | हं | सं | बि | भ्र | न्नि | खि | ल | न | भ | स | श्चि | त्र | मि | ष | या |
| स | व | र्धि | ष्णुं | वि | ष्णुं | क | लि | त | द | र | च | क्रं | तु | ल | यि | ता |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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