मम स्यादर्थानां क्षतिरिह विलम्बाद्यदपि ते
विलोकेथाः सर्वं तदपि हरिकेलिस्थलमिदम् ।
तवेयं व्यर्था भवतु शुचिता कः स हि सखे
गुणो यश्चाणूरद्विषि मतिनिवेशाय न भवेत् ॥
मम स्यादर्थानां क्षतिरिह विलम्बाद्यदपि ते
विलोकेथाः सर्वं तदपि हरिकेलिस्थलमिदम् ।
तवेयं व्यर्था भवतु शुचिता कः स हि सखे
गुणो यश्चाणूरद्विषि मतिनिवेशाय न भवेत् ॥
विलोकेथाः सर्वं तदपि हरिकेलिस्थलमिदम् ।
तवेयं व्यर्था भवतु शुचिता कः स हि सखे
गुणो यश्चाणूरद्विषि मतिनिवेशाय न भवेत् ॥
अन्वयः
AI
सखे! यद्यपि ते विलम्बात् इह मम अर्थानां क्षतिः स्यात्, तदपि इदं सर्वं हरि-केलि-स्थलं विलोकेथाः। तव इयं शुचिता व्यर्था भवतु, सः हि कः गुणः यः चाणूर-द्विषि मति-निवेशाय न भवेत्?
Summary
AI
O friend! Even if my purpose is hindered by the delay, you should still behold all these places of Hari's pastimes. For what is the use of your purity if it does not lead to fixing your mind upon the slayer of Cāṇūra?
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | म | स्या | द | र्था | नां | क्ष | ति | रि | ह | वि | ल | म्बा | द्य | द | पि | ते |
| वि | लो | के | थाः | स | र्वं | त | द | पि | ह | रि | के | लि | स्थ | ल | मि | दम् |
| त | वे | यं | व्य | र्था | भ | व | तु | शु | चि | ता | कः | स | हि | स | खे | |
| गु | णो | य | श्चा | णू | र | द्वि | षि | म | ति | नि | वे | शा | य | न | भ | वेत् |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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