तदन्ते वासन्तीविरचितमनङ्गोत्सवकला-
चतुःशालं शौरेः स्फुरति न दृशौ तत्र विकिरेः ।
तदालोकोद्भेदिप्रमदभवविस्मारितगति-
क्रिये जाते तावत् त्वयि बत हता गोपवनिता ॥
तदन्ते वासन्तीविरचितमनङ्गोत्सवकला-
चतुःशालं शौरेः स्फुरति न दृशौ तत्र विकिरेः ।
तदालोकोद्भेदिप्रमदभवविस्मारितगति-
क्रिये जाते तावत् त्वयि बत हता गोपवनिता ॥
चतुःशालं शौरेः स्फुरति न दृशौ तत्र विकिरेः ।
तदालोकोद्भेदिप्रमदभवविस्मारितगति-
क्रिये जाते तावत् त्वयि बत हता गोपवनिता ॥
अन्वयः
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तद्-अन्ते वासन्ती-विरचितम् अनङ्ग-उत्सव-कला-चतुःशालं शौरेः स्फुरति, तत्र दृशौ न विकिरेः। बत! तद्-आलोक-उद्भेदि-प्रमद-भव-विस्मारित-गति-क्रिये त्वयि जाते तावत् गोप-वनिता हता।
Summary
AI
Beyond that lies the grove of spring flowers, the square chamber for the arts of love's festival. Do not cast your eyes there! For if you were to see it and become paralyzed by the ensuing joy, forgetting your journey, we gopīs would surely be lost.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | द | न्ते | वा | स | न्ती | वि | र | चि | त | म | न | ङ्गो | त्स | व | क | ला |
| च | तुः | शा | लं | शौ | रेः | स्फु | र | ति | न | दृ | शौ | त | त्र | वि | कि | रेः |
| त | दा | लो | को | द्भे | दि | प्र | म | द | भ | व | वि | स्मा | रि | त | ग | ति |
| क्रि | ये | जा | ते | ता | व | त्त्व | यि | ब | त | ह | ता | गो | प | व | नि | ता |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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