किरन्ती लावण्यं दिशि दिशि शिखण्डस्तवकिनी
दधाना साधीयः कनकविमलज्योतिवसनम् ।
तमालश्यामाङ्गी सरलमुरलीचुम्बितमुखी
जगौ चित्रं यत्र प्रकटपरमानन्दलहरी ॥
किरन्ती लावण्यं दिशि दिशि शिखण्डस्तवकिनी
दधाना साधीयः कनकविमलज्योतिवसनम् ।
तमालश्यामाङ्गी सरलमुरलीचुम्बितमुखी
जगौ चित्रं यत्र प्रकटपरमानन्दलहरी ॥
दधाना साधीयः कनकविमलज्योतिवसनम् ।
तमालश्यामाङ्गी सरलमुरलीचुम्बितमुखी
जगौ चित्रं यत्र प्रकटपरमानन्दलहरी ॥
अन्वयः
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यत्र प्रकट-परमानन्द-लहरी दिशि दिशि लावण्यं किरन्ती, शिखण्ड-स्तवकिनी, साधीयः कनक-विमल-ज्योति-वसनं दधाना, तमाल-श्याम-अङ्गी, सरल-मुरली-चुम्बित-मुखी चित्रं जगौ।
Summary
AI
Behold the place where the wave of supreme bliss once sang. There, He whose limbs are dark like the tamāla tree, adorned with peacock feathers and robes bright as pure gold, scattered beauty in every direction while the flute touched His lips.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कि | र | न्ती | ला | व | ण्यं | दि | शि | दि | शि | शि | ख | ण्ड | स्त | व | कि | नी |
| द | धा | ना | सा | धी | यः | क | न | क | वि | म | ल | ज्यो | ति | व | स | नम् |
| त | मा | ल | श्या | मा | ङ्गी | स | र | ल | मु | र | ली | चु | म्बि | त | मु | खी |
| ज | गौ | चि | त्रं | य | त्र | प्र | क | ट | प | र | मा | न | न्द | ल | ह | री |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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