महादेवः सत्रप्रमुखमखविद्यैकचतुरः
सुमित्रा तद्भक्तिप्रणिहितमतिर्यस्य पितरौ ।
मयूखस्तेनासौ सुकविजयदेवेन रचिते
चिरं चन्द्रालोके सुखयतु महति मुनिसंख्यः ॥
महादेवः सत्रप्रमुखमखविद्यैकचतुरः
सुमित्रा तद्भक्तिप्रणिहितमतिर्यस्य पितरौ ।
मयूखस्तेनासौ सुकविजयदेवेन रचिते
चिरं चन्द्रालोके सुखयतु महति मुनिसंख्यः ॥
सुमित्रा तद्भक्तिप्रणिहितमतिर्यस्य पितरौ ।
मयूखस्तेनासौ सुकविजयदेवेन रचिते
चिरं चन्द्रालोके सुखयतु महति मुनिसंख्यः ॥
अन्वयः
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सत्र-प्रमुख-मख-विद्या-एक-चतुरः महादेवः, तत्-भक्ति-प्रणिहित-मतिः सुमित्रा च यस्य पितरौ, तेन सुकवि-जयदेवेन रचिते महति चन्द्रालोके असौ मुनि-सङ्ख्यः मयूखः चिरं सुखयतु।
Summary
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May this seventh chapter (muni-saṅkhya mayūkha) of the great Candrāloka, composed by the excellent poet Jayadeva—son of Mahādeva, an expert in sacrificial lore, and Sumitrā—provide joy for a long time.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | हा | दे | वः | स | त्र | प्र | मु | ख | म | ख | वि | द्यै | क | च | तु | रः |
| सु | मि | त्रा | त | द्भ | क्ति | प्र | णि | हि | त | म | ति | र्य | स्य | पि | त | रौ |
| म | यू | ख | स्ते | ना | सौ | सु | क | वि | ज | य | दे | वे | न | र | चि | ते |
| चि | रं | च | न्द्रा | लो | के | सु | ख | य | तु | म | ह | ति | मु | नि | सं | ख्यः |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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