महादेवः सत्रप्रमुखमखविद्यैकचतुरः
सुमित्रा तद्भक्तिप्रणिहितमतिर्यस्य पितरौ ।
मयूखस्तेनासौ सुकविजयदेवेन रचिते
चिरं चन्द्रालोके सुखयतु महति ऋतुसंख्यः ॥
महादेवः सत्रप्रमुखमखविद्यैकचतुरः
सुमित्रा तद्भक्तिप्रणिहितमतिर्यस्य पितरौ ।
मयूखस्तेनासौ सुकविजयदेवेन रचिते
चिरं चन्द्रालोके सुखयतु महति ऋतुसंख्यः ॥
सुमित्रा तद्भक्तिप्रणिहितमतिर्यस्य पितरौ ।
मयूखस्तेनासौ सुकविजयदेवेन रचिते
चिरं चन्द्रालोके सुखयतु महति ऋतुसंख्यः ॥
अन्वयः
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महादेवः सत्र-प्रमुख-मख-विद्या-एक-चतुरः सुमित्रा तत्-भक्ति-प्रणिहित-मतिः यस्य पितरौ तेन असौ सुकवि-जयदेवेन रचिते महति चन्द्रालोके ऋतु-संख्यः मयूखः चिरम् सुखयतु ।
Summary
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May this sixth chapter (the ṛtu-saṃkhya ray) of the great Raghuvaṃśam, composed by the excellent poet Jayadeva—whose parents are Mahādeva, uniquely skilled in the knowledge of sacrifices like the satra, and Sumitrā, whose mind is devoted to him—provide lasting joy.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | हा | दे | वः | स | त्र | प्र | मु | ख | म | ख | वि | द्यै | क | च | तु | रः |
| सु | मि | त्रा | त | द्भ | क्ति | प्र | णि | हि | त | म | ति | र्य | स्य | पि | त | रौ |
| म | यू | ख | स्ते | ना | सौ | सु | क | वि | ज | य | दे | वे | न | र | चि | ते |
| चि | रं | च | न्द्रा | लो | के | सु | ख | य | तु | म | ह | ति | ऋ | तु | सं | ख्यः |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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