हं हो चिन्मयचित्तचन्द्रमणयः संवर्धयध्वं रसा-
न्रे रे स्वैरिणि निर्विचारकविते मास्मत्प्रकाशीभव ।
उल्लासाय विचारवीचिनिचयालङ्कारवाराम्निधे-
श्चन्द्रालोकमयं स्वयं वितनुते पीयूषवर्षः कृती ॥
हं हो चिन्मयचित्तचन्द्रमणयः संवर्धयध्वं रसा-
न्रे रे स्वैरिणि निर्विचारकविते मास्मत्प्रकाशीभव ।
उल्लासाय विचारवीचिनिचयालङ्कारवाराम्निधे-
श्चन्द्रालोकमयं स्वयं वितनुते पीयूषवर्षः कृती ॥
न्रे रे स्वैरिणि निर्विचारकविते मास्मत्प्रकाशीभव ।
उल्लासाय विचारवीचिनिचयालङ्कारवाराम्निधे-
श्चन्द्रालोकमयं स्वयं वितनुते पीयूषवर्षः कृती ॥
अन्वयः
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हं हो चिन्मय-चित्त-चन्द्रमणयः रसान् संवर्धयध्वम्; रे रे स्वैरिणि निर्विचार-कविते अस्मत् मा प्रकाशीभव; विचार-वीचि-निचय-अलङ्कार-वाराम्-निधेः उल्लासाय कृती पीयूष-वर्षः स्वयं चन्द्रालोक-मयम् वितनुते।
Summary
AI
O moonstones of the conscious mind, increase the aesthetic rasas! O wayward, thoughtless poetry, do not manifest before me! For the delight of the ocean of rhetoric, filled with waves of inquiry, the skillful author Pīyūṣavarṣa himself composes this work called Candrāloka.
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| हं | हो | चि | न्म | य | चि | त्त | च | न्द्र | म | ण | यः | सं | व | र्ध | य | ध्वं | र | सा |
| न्रे | रे | स्वै | रि | णि | नि | र्वि | चा | र | क | वि | ते | मा | स्म | त्प्र | का | शी | भ | व |
| उ | ल्ला | सा | य | वि | चा | र | वी | चि | नि | च | या | ल | ङ्का | र | वा | रा | म्नि | धे |
| श्च | न्द्रा | लो | क | म | यं | स्व | यं | वि | त | नु | ते | पी | यू | ष | व | र्षः | कृ | ती |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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