स्थानं नः पूर्वजानामियमधिकमसौ प्रेयसी पूरयोध्या
दूरादालोक्यते या हुतविविधहविः प्रीणिताऽशेषदेवा ।
सोऽयं देशो रुदन्तं पुरजनमखिलं यत्र हित्वा प्रयातौ
आवां सीते वनाऽन्तं सह धृतधृतिना लक्ष्मणेन क्षपाऽन्ते ॥
स्थानं नः पूर्वजानामियमधिकमसौ प्रेयसी पूरयोध्या
दूरादालोक्यते या हुतविविधहविः प्रीणिताऽशेषदेवा ।
सोऽयं देशो रुदन्तं पुरजनमखिलं यत्र हित्वा प्रयातौ
आवां सीते वनाऽन्तं सह धृतधृतिना लक्ष्मणेन क्षपाऽन्ते ॥
दूरादालोक्यते या हुतविविधहविः प्रीणिताऽशेषदेवा ।
सोऽयं देशो रुदन्तं पुरजनमखिलं यत्र हित्वा प्रयातौ
आवां सीते वनाऽन्तं सह धृतधृतिना लक्ष्मणेन क्षपाऽन्ते ॥
Karandikar
This, the place of our ancestors, this very dear city of Ayodhya wherein all the Gods without a remnant are propitiated with various oblations offered (to them), is seen from afar ; this, Oh Sita, is the region from where having left all the citizen-folk weeping, we two , along with Laksmana who had sustained his courage, went at the end of the night to the sylvan region.
छन्दः
स्रग्धरा [२१: मरभनययय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्था | नं | नः | पू | र्व | जा | ना | मि | य | म | धि | क | म | सौ | प्रे | य | सी | पू | र | यो | ध्या |
| दू | रा | दा | लो | क्य | ते | या | हु | त | वि | वि | ध | ह | विः | प्री | णि | ता | ऽशे | ष | दे | वा |
| सो | ऽयं | दे | शो | रु | द | न्तं | पु | र | ज | न | म | खि | लं | य | त्र | हि | त्वा | प्र | या | तौ |
| आ | वां | सी | ते | व | ना | ऽन्तं | स | ह | धृ | त | धृ | ति | ना | ल | क्ष्म | णे | न | क्ष | पा | ऽन्ते |
| म | र | भ | न | य | य | य | ||||||||||||||
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