संदर्शितस्नेहगुणः स्वशत्रू-
न्विद्वेषयन्मण्डलमस्य भिन्द्यात् ।
इत्येवमादि प्रविधाय संधिर्-
वृद्धेर्विधेयोऽधिगमाभ्युपायः ॥
संदर्शितस्नेहगुणः स्वशत्रू-
न्विद्वेषयन्मण्डलमस्य भिन्द्यात् ।
इत्येवमादि प्रविधाय संधिर्-
वृद्धेर्विधेयोऽधिगमाभ्युपायः ॥
न्विद्वेषयन्मण्डलमस्य भिन्द्यात् ।
इत्येवमादि प्रविधाय संधिर्-
वृद्धेर्विधेयोऽधिगमाभ्युपायः ॥
Karandikar
'Causing his enemies to hate (one another), he who has exhibited the quality of love, should break up his ( enemy's) circle of allies. Having manoeuvred this and such other things , should be contracted peace, which is the means of prosperity.
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | द | र्शि | त | स्ने | ह | गु | णः | स्व | श | त्रू |
| न्वि | द्वे | ष | य | न्म | ण्ड | ल | म | स्य | भि | न्द्या |
| ति | त्ये | व | मा | दि | प्र | वि | धा | य | सं | धि |
| र्वृ | द्धे | र्वि | धे | यो | ऽधि | ग | मा | भ्यु | पा | यः |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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