क्रुध्यन्कुलं धक्ष्यति विप्रवह्नि-
र्यास्यन्सुतस्तप्स्यति मां समन्युम् ।
इत्थं नृपः पूर्वमवालुलोचे
ततोऽनुजज्ञे गमनं सुतस्य ॥
क्रुध्यन्कुलं धक्ष्यति विप्रवह्नि-
र्यास्यन्सुतस्तप्स्यति मां समन्युम् ।
इत्थं नृपः पूर्वमवालुलोचे
ततोऽनुजज्ञे गमनं सुतस्य ॥
र्यास्यन्सुतस्तप्स्यति मां समन्युम् ।
इत्थं नृपः पूर्वमवालुलोचे
ततोऽनुजज्ञे गमनं सुतस्य ॥
Karandikar
''The raging fire in the form of the brahmin's will burn out my race. By going, (my) son will torment only my grief-striken self." Thus did the king reflect first and then permit the departure of his son.
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्रु | ध्य | न्कु | लं | ध | क्ष्य | ति | वि | प्र | व | ह्नि |
| र्या | स्य | न्सु | त | स्त | प्स्य | ति | मां | स | म | न्यु |
| मि | त्थं | नृ | पः | पू | र्व | म | वा | लु | लो | चे |
| त | तो | ऽनु | ज | ज्ञे | ग | म | नं | सु | त | स्य |
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