इति वदति सखीजने निमील-
द्विगुणितसान्द्रतराक्षिपक्ष्ममाला ।
अपदतलिभयेन भर्तुरङ्गं
भवति हि विक्लवता गुणोऽङ्गनानाम् ॥
इति वदति सखीजने निमील-
द्विगुणितसान्द्रतराक्षिपक्ष्ममाला ।
अपदतलिभयेन भर्तुरङ्गं
भवति हि विक्लवता गुणोऽङ्गनानाम् ॥
द्विगुणितसान्द्रतराक्षिपक्ष्ममाला ।
अपदतलिभयेन भर्तुरङ्गं
भवति हि विक्लवता गुणोऽङ्गनानाम् ॥
मल्लिनाथः
(विशेषकम् ।) इतीति ॥ इतीत्थं सख्येव जनस्तस्मिन् सखीजने वदति सति निमीलन्त्यौ भयान्मुकुलीभवन्त्यौ अत एव द्वे आवृत्ती ययोस्ते द्विगुणे द्विरावृत्ते । `गुणास्त्वावृत्तिशब्दादिज्येन्द्रियामुख्यतन्तुषु` इति वैजयन्ती । ते कृते द्विगुणिते अत एव सान्द्रतरे अक्षिपक्ष्ममाले नेत्रलोमपङ्क्ती यस्याः सा । काचिदिति शेषः । अक्षिग्रहणस्य पक्ष्मद्वयद्वैगुण्यलक्ष्मीरक्ष्णोरेवेति द्योतनार्थत्वान्न पौनरुक्त्यम् । अलिभयेन भर्तुरङ्कमुत्सङ्गमपतत् प्राप्तवती । अहो महत्कष्टं यत्कीटकादपि भयमित्याशङ्क्याह-अङ्गनानाम् । न तु पुंसामिति भावः । विक्लवता भीरुता गुणो भवति हि । न तु दोष इति भावः । अत एव जनसमक्षं भर्तुरङ्कारोहणमपि न दोषः । पार्श्वस्थालम्बनादीनां भयानुभावत्वात् । कुलकेऽलंकारोऽयमर्थान्तरन्यासः
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | व | द | ति | स | खी | ज | ने | नि | मी | ल | |
| द्वि | गु | णि | त | सा | न्द्र | त | रा | क्षि | प | क्ष्म | मा | ला |
| अ | प | द | त | लि | भ | ये | न | भ | र्तु | र | ङ्गं | |
| भ | व | ति | हि | वि | क्ल | व | ता | गु | णो | ऽङ्ग | ना | नाम् |
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