मल्लिनाथः
शमितेति ॥ अम्बुमुचो मेघाः प्रविरलैरम्भसां प्रथमबिन्दुभिः शमिततापमपोढमहीरजो निरस्तधूलिकम् । न तु पङ्कितमिति भावः । सुगन्धि संतप्तसेकादुद्भूतसौरभम् । इह तदेकान्तत्वाद्गन्धस्येत्वम् । अचलाङ्गनं रैवतकाङ्गनम् । `अङ्गनं चत्वराजिरे` इत्यमरः । अङ्गनाजनस्य सुखेन गच्छत्यस्मिन्निति सुगम् । सुखसंचारमित्यर्थः । `सुदुरोरधिकरणे` (वा०) इति गमेर्डप्रत्यये टिलोपः । न न चक्रिरे । चक्रिरे इत्यर्थः । द्वौ नजौ प्रकृतमर्थं गमयतः
छन्दः
द्रुतविलम्बितम् [१२: नभभर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श | मि | त | ता | प | म | पो | ढ | म | ही | र | जः |
| प्र | थ | म | बि | न्दु | भि | र | म्बु | मु | चो | ऽम्भ | सां |
| प्र | वि | र | लै | र | च | ला | ङ्ग | न | म | ङ्ग | ना |
| ज | न | सु | गं | न | सु | ग | न्धि | न | च | क्रि | रे |
| न | भ | भ | र | ||||||||
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