दुःखेन भोजयितुमाशयिता शशाक
तुङ्गाग्रकायमनमन्तमनादरेण ।
उत्क्षिप्तहस्ततलदत्तविधानपिण्ड-
स्नेहस्रुति स्नपितबाहुरिभाधिराजम् ॥
दुःखेन भोजयितुमाशयिता शशाक
तुङ्गाग्रकायमनमन्तमनादरेण ।
उत्क्षिप्तहस्ततलदत्तविधानपिण्ड-
स्नेहस्रुति स्नपितबाहुरिभाधिराजम् ॥
तुङ्गाग्रकायमनमन्तमनादरेण ।
उत्क्षिप्तहस्ततलदत्तविधानपिण्ड-
स्नेहस्रुति स्नपितबाहुरिभाधिराजम् ॥
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दुः | खे | न | भो | ज | यि | तु | मा | श | यि | ता | श | शा | क |
| तु | ङ्गा | ग्र | का | य | म | न | म | न्त | म | ना | द | रे | ण |
| उ | त्क्षि | प्त | ह | स्त | त | ल | द | त्त | वि | धा | न | पि | ण्ड |
| स्ने | ह | स्रु | ति | स्न | पि | त | बा | हु | रि | भा | धि | रा | जम् |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.