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श्रिया जुष्टं दिव्यैः सपटहरवैरन्वितं पुष्पवर्षै-
र्वपुष्टचैद्यस्य क्षणमृषिगणैः स्तूयमानं निरीय ।
प्रकाशेनाकाशे दिनकरकरान्विक्षिपद्विस्मिताक्षै-
र्नरेन्द्रैरौपेन्द्रं वपुरथ विशद्धाम वीक्षांबभूवे ॥

छन्दः मेघविस्फूर्जिता [१९: यमनसररग]
छन्दोविश्लेषणम्
१० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७ १८ १९
श्रि या जु ष्टं दि व्यैः वै न्वि तं पु ष्प र्षै
र्व पु ष्ट चै द्य स्य क्ष मृ षि णैः स्तू मा नं नि री
प्र का शे ना का शे दि रा न्वि क्षि द्वि स्मि ता क्षै
र्न रे न्द्रै रौ पे न्द्रं पु वि द्धा वी क्षां भू वे
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