इति नरपतिरस्त्रं यद्यदाविश्चकार
प्रकुपित इव रोगः क्षिप्रकारी विकारम् ।
भिषगिव गुरुदोषच्छेदिनोपक्रमेण
क्रमविदथ मुरारिः प्रत्यहंस्तत्तदाशु ॥
इति नरपतिरस्त्रं यद्यदाविश्चकार
प्रकुपित इव रोगः क्षिप्रकारी विकारम् ।
भिषगिव गुरुदोषच्छेदिनोपक्रमेण
क्रमविदथ मुरारिः प्रत्यहंस्तत्तदाशु ॥
प्रकुपित इव रोगः क्षिप्रकारी विकारम् ।
भिषगिव गुरुदोषच्छेदिनोपक्रमेण
क्रमविदथ मुरारिः प्रत्यहंस्तत्तदाशु ॥
मल्लिनाथः
इतीति ॥ इतीत्थं क्षिप्रं करोतीति क्षिप्रकारी शीघ्रप्रयोक्ता, अन्यत्र विकारकारी नरपतिश्चैद्यः प्रकुपितः प्रक्षुभितः सन् यद्यदस्वमाविश्वकार रोगो विकारमिव अथ क्रमवित्परिपाटीवेदी मुरारिभिषग्वैद्य इव गुरुदोषच्छेदिना गुरुदोषप्रतिघातकेन दोषपनिवर्तकेन चोपक्रमेणोपायेन । प्रत्यस्वप्रयोगेणेत्यर्थः । अन्यत्र महौषधप्रयोगेण तत्तदत्रं आशु शीघ्रम् । तद्विकारमिवेति भावः । प्रत्यहन् प्रतिजघान । हन्तेर्लङ् अदादित्वाच्छपो लुक् `हल्याप्` (अष्टाध्यायी ६.१.६८ ) इति लोपः । उपमा
छन्दः
मालिनी [१५: ननमयय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | न | र | प | ति | र | स्त्रं | य | द्य | दा | वि | श्च | का | र |
| प्र | कु | पि | त | इ | व | रो | गः | क्षि | प्र | का | री | वि | का | रम् |
| भि | ष | गि | व | गु | रु | दो | ष | च्छे | दि | नो | प | क्र | मे | ण |
| क्र | म | वि | द | थ | मु | रा | रिः | प्र | त्य | हं | स्त | त्त | दा | शु |
| न | न | म | य | य | ||||||||||
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