व्यगमन्सहसा दिशां मुखेभ्यः
शमयित्वा शिखिनाङ्घनाघनौघाः ।
उपकृत्यनिसर्गतः परेषा-
मुपरोधं न हि कुर्वते महान्तः ॥
व्यगमन्सहसा दिशां मुखेभ्यः
शमयित्वा शिखिनाङ्घनाघनौघाः ।
उपकृत्यनिसर्गतः परेषा-
मुपरोधं न हि कुर्वते महान्तः ॥
शमयित्वा शिखिनाङ्घनाघनौघाः ।
उपकृत्यनिसर्गतः परेषा-
मुपरोधं न हि कुर्वते महान्तः ॥
मल्लिनाथः
व्यगमन्निति ॥ घनाघनौघाः वर्युकाब्दसमूहाः । `शक्रधातुकमत्तेभवर्षकाव्दा घनाघनाः` इत्यमरः । शिखिनमग्निं शमयित्वा सहसा दिशां मुखेभ्यो व्यगमन्नपसत्रुः । गमेलङि `पुषादि-` (अष्टाध्यायी ३.१.५५ ) इति च्लेरङादेशः । तथा हिमहान्तो निसर्गतः स्वभावादेव परेषां उपकृत्य उपकारं कृत्वा उपरोधं न हि कुर्वते । महतां निष्फलावस्थानं परोपरोधायेति भावः । सामान्येन विशेषसमर्थनरूपोऽर्थान्तरन्यासः
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व्य | ग | म | न्स | ह | सा | दि | शां | मु | खे | भ्यः | |
| श | म | यि | त्वा | शि | खि | ना | ङ्घ | ना | घ | नौ | घाः |
| उ | प | कृ | त्य | नि | स | र्ग | तः | प | रे | षा | |
| मु | प | रो | धं | न | हि | कु | र्व | ते | म | हा | न्तः |
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