अभिवीक्ष्य विदर्भराजपुत्री-
कुचकाश्मीरजचिह्नमच्युतोरः ।
चिरसेवितयापि चेदिराजः
सहसावाप रुषा तदैव योगम् ॥
अभिवीक्ष्य विदर्भराजपुत्री-
कुचकाश्मीरजचिह्नमच्युतोरः ।
चिरसेवितयापि चेदिराजः
सहसावाप रुषा तदैव योगम् ॥
कुचकाश्मीरजचिह्नमच्युतोरः ।
चिरसेवितयापि चेदिराजः
सहसावाप रुषा तदैव योगम् ॥
मल्लिनाथः
अभीति ॥ चेदिराजः शिशुपालः । `राजाहःसखिभ्यष्टच्` (अष्टाध्यायी ५.४.९१ ) । विदर्भराजपुत्र्या रुक्मिण्याः कुचयोर्यकाश्मीरज कुङ्कुमं तच्चिह्नं यस्य तदच्युतोरः कृष्णवक्षः अभिवीक्ष्य चिरसेवितया चिरोपयुजापि । रुक्मिणीहरणात्प्रभृति संभृतयापीत्यर्थः । रुषा रोषेण तदैव तदानीमिवेत्युत्प्रेक्षा । सहसा योगं संबन्धमवाप । यथा कामी काम्यन्तरभोगचिह्नदर्शनोद्दीप्तः कान्तया संयुज्यते तद्वदित्यर्थः । परमार्थस्वरूप एव कोपो वैदर्भीकुचकुङ्कुमदर्शनादुद्दीपित इत्यर्थः । अत्र प्रकृतरुविशेषणसाम्यादप्रकृतकान्ताप्रतीतेः समासोक्तिः, उक्तोत्प्रेक्षा त्वङ्गमस्याः
छन्दः
औपच्छन्दसिक
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | भि | वी | क्ष्य | वि | द | र्भ | रा | ज | पु | त्री | |
| कु | च | का | श्मी | र | ज | चि | ह्न | म | च्यु | तो | रः |
| चि | र | से | वि | त | या | पि | चे | दि | रा | जः | |
| स | ह | सा | वा | प | रु | षा | त | दै | व | यो | गम् |
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