मल्लिनाथः
संहत्येति ॥ भास्वरा तेजिष्ठा सेना यस्यास्तया भास्वरसेनया सात्वतां यदूनां संहत्या सङ्गेन चैद्यं प्रति ववले प्रचेले । `वल चलने` इति धातोर्भावे लिट् `न शसददवादि ` (अष्टाध्यायी ६.४.१२६ ) इति वकारादित्वादेत्वाभ्यासलोपयोः प्रतिषेधः । या यदूनां संहतिः स्वरसेन स्वभावेन योद्धुमुत्पन्नप्रतिभा संजातप्रतिभा या स्वयं रणकण्डूला सा पराहूता कथं निवर्तत इति भावः
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | ह | त्या | सा | त्व | तां | चै | द्यं |
| प्र | ति | भा | स्व | र | से | न | या |
| व | व | ले | यो | द्धु | मु | त्प | न्न |
| प्र | ति | मा | स्व | र | से | न | या |
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