सुसंहतैर्दधदपि धाम नीयते
तिरस्कृतिं बहुभिरसंशयं परैः ।
यतः क्षितेरवयवसंपदोऽणव-
स्त्विषां निधेरपि वपुरावरीषत ॥
सुसंहतैर्दधदपि धाम नीयते
तिरस्कृतिं बहुभिरसंशयं परैः ।
यतः क्षितेरवयवसंपदोऽणव-
स्त्विषां निधेरपि वपुरावरीषत ॥
तिरस्कृतिं बहुभिरसंशयं परैः ।
यतः क्षितेरवयवसंपदोऽणव-
स्त्विषां निधेरपि वपुरावरीषत ॥
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सु | सं | ह | तै | र्द | ध | द | पि | धा | म | नी | य | ते |
| ति | र | स्कृ | तिं | ब | हु | भि | र | सं | श | यं | प | रैः |
| य | तः | क्षि | ते | र | व | य | व | सं | प | दो | ऽण | व |
| स्त्वि | षां | नि | धे | र | पि | व | पु | रा | व | री | ष | त |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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