उपाहितैर्वपुषि निवातवर्मभिः
स्फुरन्मणिप्रसृतमरीचिसूचिभिः ।
निरन्तरं नरपतयो रणाजिरे
रराजिरे शरनिकराचिता इव ॥
उपाहितैर्वपुषि निवातवर्मभिः
स्फुरन्मणिप्रसृतमरीचिसूचिभिः ।
निरन्तरं नरपतयो रणाजिरे
रराजिरे शरनिकराचिता इव ॥
स्फुरन्मणिप्रसृतमरीचिसूचिभिः ।
निरन्तरं नरपतयो रणाजिरे
रराजिरे शरनिकराचिता इव ॥
मल्लिनाथः
उपाहितैरिति ॥ रणाजिरे रणाङ्गणे नरपतयो राजानो वपुषि उपाहितैरामुक्तैः स्फुरन्तो मणिप्रसृता रत्ननिर्गता मरीचय एव सूचयो येषां तैः निवातवर्मभिरच्छिन्द्रकञ्चुकैः । `निवातो दृढसंनाहे निर्वाते चाश्रयेऽपि च` इति विश्वः । `तनुत्रं वर्म कञ्चुकम्` इत्यमरः । निरन्तरं नीरन्ध्रं शरनिकरैराचिताः प्रोता इव रराजिरे । `फणां च सप्तानाम्` (अष्टाध्यायी ६.४.१२५ ) इति विकल्पादेत्वाभ्यासलोपाभावः । मणिरोचिषः सादृश्याच्छरनिकरत्वोत्प्रेक्षा
छन्दः
रुचिरा [१३: जभसजग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| उ | पा | हि | तै | र्व | पु | षि | नि | वा | त | व | र्म | भिः |
| स्फु | र | न्म | णि | प्र | सृ | त | म | री | चि | सू | चि | भिः |
| नि | र | न्त | रं | न | र | प | त | यो | र | णा | जि | रे |
| र | रा | जि | रे | श | र | नि | क | रा | चि | ता | इ | व |
| ज | भ | स | ज | ग | ||||||||
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