प्रासदशोभातिशयालुभिः पथि
प्रभोनिवासाः पटवेश्मभिर्बभुः ।
नूनं सहानेन वियोगविक्लवा
पुरः पुरश्रीरपि निर्ययौ तदा ॥
प्रासदशोभातिशयालुभिः पथि
प्रभोनिवासाः पटवेश्मभिर्बभुः ।
नूनं सहानेन वियोगविक्लवा
पुरः पुरश्रीरपि निर्ययौ तदा ॥
प्रभोनिवासाः पटवेश्मभिर्बभुः ।
नूनं सहानेन वियोगविक्लवा
पुरः पुरश्रीरपि निर्ययौ तदा ॥
मल्लिनाथः
प्रासादेति ॥ पथि मार्गे प्रभोः कृष्णस्य निवासाः सेनानिवेशाः प्रासादशोभामतिशयालुभिरतिशायकैः । आलुचि शीङ्ग्रहणमपि कर्तव्यमित्यालुच्प्रत्ययः । पटवेश्मभिः पटवस्त्रैर्बभुः तेनोत्प्रेक्ष्यते । द्वारकानिर्याणकालेऽनेन कृष्णेन सह वियोगविक्लवा विरहभीरुः पुरश्रीर्द्वारकानगरलक्ष्मीरपि पुरोऽग्रे निर्ययौ निर्गता । नूनं द्वारकातो न भिद्यन्ते अस्य निवासाः शोभयेति भावः
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रा | स | द | शो | भा | ति | श | या | लु | भिः | प | थि |
| प्र | भो | नि | वा | साः | प | ट | वे | श्म | भि | र्ब | भुः |
| नू | नं | स | हा | ने | न | वि | यो | ग | वि | क्ल | वा |
| पु | रः | पु | र | श्री | र | पि | नि | र्य | यौ | त | दा |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.