मल्लिनाथः
पीतवतीति ॥ विददङ्घौ विदंष्टुमिच्छौ । उपदंशेच्छावतीत्यर्थः । दंशेः सन्नन्तादुप्रत्ययः । अभिमते वल्लभे मधुना तुल्यस्वादं तुल्यरसं । तुल्यत्वं च हृद्यतामात्रेण नान्यथा विलक्षणरसस्य अनुपदंशत्वात् ओष्ठो रुचकमाभरणमिवेत्युपमितसमासः । रोचनायां तु रुचकमश्वाभरणमाल्ययोः` इति विश्वः । तमोष्ठरुचकमोष्ठश्रेष्ठं पीतवति सति वियता अपगच्छतापि । इणो लटः शनादेशे `इणो यण` (६|४|८१) इति यणादेशः । युवत्याः युवतेः । `ङिति ह्रस्वश्व` (अष्टाध्यायी १.४.६ ) इति वा नदीत्वादाडागमः । यावकेनालक्तकेन परिरक्ततया दन्तनिष्पीडनकृतेन रागेण हेतुना आत्मा स्वरूपं लभ्यते स्म लब्धः । पुनरुद्भूतमित्यर्थः । अत्राधरपानादपगतस्यापि यावकस्य रागप्रादुर्भावनिमित्ता विरोधगर्भा पुनरुद्भवोत्प्रेक्षा व्यञ्जकाप्रयोगाद्गम्या च
छन्दः
स्वागता [११: रनभगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | ति | व | त्य | भि | म | ते | म | धु | तु | |
| ल्य | स्वा | द | मो | ष्ठ | कं | वि | द | द | ङ्क्षौ | |
| ल | भ्य | ते | स्म | प | रि | र | क्त | त | या | त्मा |
| या | व | के | न | वि | य | ता | पि | यु | व | त्याः |
| र | न | भ | ग | ग | ||||||
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