अर्चन्तस्तरुणेन्दुचूडमसकृत्संकीर्तयन्तो हरिं
ध्यायन्तस्त्रिजगद्विमोहजननीं शक्तिं परां शांभवीम् ।
आज्ञां मूर्धनि बिभ्रतः सुरगुरोरानन्दयन्तो मुनीन्
स्वच्छन्दं त्रिदिवौकसो बुभुजिरे स्वाराज्यमव्याहतम् ॥
अर्चन्तस्तरुणेन्दुचूडमसकृत्संकीर्तयन्तो हरिं
ध्यायन्तस्त्रिजगद्विमोहजननीं शक्तिं परां शांभवीम् ।
आज्ञां मूर्धनि बिभ्रतः सुरगुरोरानन्दयन्तो मुनीन्
स्वच्छन्दं त्रिदिवौकसो बुभुजिरे स्वाराज्यमव्याहतम् ॥
ध्यायन्तस्त्रिजगद्विमोहजननीं शक्तिं परां शांभवीम् ।
आज्ञां मूर्धनि बिभ्रतः सुरगुरोरानन्दयन्तो मुनीन्
स्वच्छन्दं त्रिदिवौकसो बुभुजिरे स्वाराज्यमव्याहतम् ॥
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | र्च | न्त | स्त | रु | णे | न्दु | चू | ड | म | स | कृ | त्सं | की | र्त | य | न्तो | ह | रिं |
| ध्या | य | न्त | स्त्रि | ज | ग | द्वि | मो | ह | ज | न | नीं | श | क्तिं | प | रां | शां | भ | वीम् |
| आ | ज्ञां | मू | र्ध | नि | बि | भ्र | तः | सु | र | गु | रो | रा | न | न्द | य | न्तो | मु | नी |
| न्स्व | च्छ | न्दं | त्रि | दि | वौ | क | सो | बु | भु | जि | रे | स्वा | रा | ज्य | म | व्या | ह | तम् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.