स्वेनैव भ्रमयति माधवे भुजाभ्यां
बभ्राम भ्रमरकवत्स शैलराजः ।
किं चित्रं भ्रमति महर्षिसिद्धसङ्घे
मृद्भारे क्वचन महान्भ्रमोऽजनीति ॥
स्वेनैव भ्रमयति माधवे भुजाभ्यां
बभ्राम भ्रमरकवत्स शैलराजः ।
किं चित्रं भ्रमति महर्षिसिद्धसङ्घे
मृद्भारे क्वचन महान्भ्रमोऽजनीति ॥
बभ्राम भ्रमरकवत्स शैलराजः ।
किं चित्रं भ्रमति महर्षिसिद्धसङ्घे
मृद्भारे क्वचन महान्भ्रमोऽजनीति ॥
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्वे | नै | व | भ्र | म | य | ति | मा | ध | वे | भु | जा | भ्यां |
| ब | भ्रा | म | भ्र | म | र | क | व | त्स | शै | ल | रा | जः |
| किं | चि | त्रं | भ्र | म | ति | म | ह | र्षि | सि | द्ध | स | ङ्घे |
| मृ | द्भा | रे | क्व | च | न | म | हा | न्भ्र | मो | ऽज | नी | ति |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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