प्रागेव पातालजुषां प्रवृत्तिं
जिज्ञासवो दारकुमारकाणाम् ।
ते मन्दरोद्धारबिलाध्वनैव
सद्योऽवतेरुदनुजाः प्रहृष्टाः ॥
प्रागेव पातालजुषां प्रवृत्तिं
जिज्ञासवो दारकुमारकाणाम् ।
ते मन्दरोद्धारबिलाध्वनैव
सद्योऽवतेरुदनुजाः प्रहृष्टाः ॥
जिज्ञासवो दारकुमारकाणाम् ।
ते मन्दरोद्धारबिलाध्वनैव
सद्योऽवतेरुदनुजाः प्रहृष्टाः ॥
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रा | गे | व | पा | ता | ल | जु | षां | प्र | वृ | त्तिं |
| जि | ज्ञा | स | वो | दा | र | कु | मा | र | का | णाम् |
| ते | म | न्द | रो | द्धा | र | बि | ला | ध्व | नै | व |
| स | द्यो | ऽव | ते | रु | द | नु | जाः | प्र | हृ | ष्टाः |
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