स्थानाच्च्यावयितुं क्षणात्पुनरपि स्थानेऽभिषेक्तुं च वा
शक्ताः केलिकथान्तरेष्वपि भवन्त्योद्गता यद्गि- ।
रः तेऽमी सर्वसुनिर्वृता दनुभुवः संधाय किं धावता
भिक्षार्थं परितोऽधुना मघवता संपादयन्त्वीप्सितम् ॥
स्थानाच्च्यावयितुं क्षणात्पुनरपि स्थानेऽभिषेक्तुं च वा
शक्ताः केलिकथान्तरेष्वपि भवन्त्योद्गता यद्गि- ।
रः तेऽमी सर्वसुनिर्वृता दनुभुवः संधाय किं धावता
भिक्षार्थं परितोऽधुना मघवता संपादयन्त्वीप्सितम् ॥
शक्ताः केलिकथान्तरेष्वपि भवन्त्योद्गता यद्गि- ।
रः तेऽमी सर्वसुनिर्वृता दनुभुवः संधाय किं धावता
भिक्षार्थं परितोऽधुना मघवता संपादयन्त्वीप्सितम् ॥
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स्था | ना | च्च्या | व | यि | तुं | क्ष | णा | त्पु | न | र | पि | स्था | ने | ऽभि | षे | क्तुं | च | वा | |
| श | क्ताः | के | लि | क | था | न्त | रे | ष्व | पि | भ | व | न्त्यो | द्ग | ता | य | द्गि | |||
| रः | ते | ऽमी | स | र्व | सु | नि | र्वृ | ता | द | नु | भु | वः | सं | धा | य | किं | धा | व | ता |
| भि | क्षा | र्थं | प | रि | तो | ऽधु | ना | म | घ | व | ता | सं | पा | द | य | न्त्वी | प्सि | तम् | |
| म | स | ज | स | त | त | ग | |||||||||||||
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