अभ्यर्णस्थलभाजि तत्र शिखरिण्यामूलमुन्मूलिते
तत्क्षोभक्षुभिते च काञ्चनगिरौ किंचित्समाकुश्चिते ।
विभ्रश्यगृहभित्ति विश्लथपुरद्वारं विशीर्णत्रुट
त्सौधोत्सेधविटङ्कसंघमजनि स्थानं सुराणां तदा ॥
अभ्यर्णस्थलभाजि तत्र शिखरिण्यामूलमुन्मूलिते
तत्क्षोभक्षुभिते च काञ्चनगिरौ किंचित्समाकुश्चिते ।
विभ्रश्यगृहभित्ति विश्लथपुरद्वारं विशीर्णत्रुट
त्सौधोत्सेधविटङ्कसंघमजनि स्थानं सुराणां तदा ॥
तत्क्षोभक्षुभिते च काञ्चनगिरौ किंचित्समाकुश्चिते ।
विभ्रश्यगृहभित्ति विश्लथपुरद्वारं विशीर्णत्रुट
त्सौधोत्सेधविटङ्कसंघमजनि स्थानं सुराणां तदा ॥
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | भ्य | र्ण | स्थ | ल | भा | जि | त | त्र | शि | ख | रि | ण्या | मू | ल | मु | न्मू | लि | ते |
| त | त्क्षो | भ | क्षु | भि | ते | च | का | ञ्च | न | गि | रौ | किं | चि | त्स | मा | कु | श्चि | ते |
| वि | भ्र | श्य | गृ | ह | भि | त्ति | वि | श्ल | थ | पु | र | द्वा | रं | वि | शी | र्ण | त्रु | ट |
| त्सौ | धो | त्से | ध | वि | ट | ङ्क | सं | घ | म | ज | नि | स्था | नं | सु | रा | णां | त | दा |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.