अथवा नैतावदभिधातव्यमस्माभिः अभिदधति ते
मूर्धानं द्यामनुश्रवसूक्तयः सुचिरमसुराश्चैतामित्थं तुदन्ति दुराशयाः ।
निगमशिखराभ्यासव्यासङ्गतो यदि विस्मृतं
तदपि भवता तन्नो दौष्कर्म्यमित्युपरम्यते ॥
अथवा नैतावदभिधातव्यमस्माभिः अभिदधति ते
मूर्धानं द्यामनुश्रवसूक्तयः सुचिरमसुराश्चैतामित्थं तुदन्ति दुराशयाः ।
निगमशिखराभ्यासव्यासङ्गतो यदि विस्मृतं
तदपि भवता तन्नो दौष्कर्म्यमित्युपरम्यते ॥
मूर्धानं द्यामनुश्रवसूक्तयः सुचिरमसुराश्चैतामित्थं तुदन्ति दुराशयाः ।
निगमशिखराभ्यासव्यासङ्गतो यदि विस्मृतं
तदपि भवता तन्नो दौष्कर्म्यमित्युपरम्यते ॥
विस्तारः
अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ इति श्रुतौ अमिपदं तदुपल क्षितवर्गलोकपरमिति व्याख्यात तद्भाध्ये ॥
छन्दः
हरिणी [१७: नसमरसलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ | २२ | २३ | २४ | २५ | २६ | २७ | २८ |
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| अ | थ | वा | नै | ता | व | द | भि | धा | त | व्य | म | स्मा | भिः | अ | भि | द | ध | ति | ते | ||||||||
| मू | र्धा | नं | द्या | म | नु | श्र | व | सू | क्त | यः | सु | चि | र | म | सु | रा | श्चै | ता | मि | त्थं | तु | द | न्ति | दु | रा | श | याः |
| नि | ग | म | शि | ख | रा | भ्या | स | व्या | स | ङ्ग | तो | य | दि | वि | स्मृ | तं | |||||||||||
| त | द | पि | भ | व | ता | त | न्नो | दौ | ष्क | र्म्य | मि | त्यु | प | र | म्य | ते | |||||||||||
| न | स | म | र | स | ल | ग | |||||||||||||||||||||
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