किच भूतग्राममिमं चतुर्विधमहो निर्मासि यल्लीलया
यच्च व्याकुरुषे निरन्तरमिभाः साङ्गाश्चतस्रः श्रुतीः ।
चातुर्यं कथमीदृगित्यपगता शङ्का समस्तापि न
श्चातुर्यं भवतो युजेष्वपि मुखेष्वद्य स्वयं पश्यताम् ॥
किच भूतग्राममिमं चतुर्विधमहो निर्मासि यल्लीलया
यच्च व्याकुरुषे निरन्तरमिभाः साङ्गाश्चतस्रः श्रुतीः ।
चातुर्यं कथमीदृगित्यपगता शङ्का समस्तापि न
श्चातुर्यं भवतो युजेष्वपि मुखेष्वद्य स्वयं पश्यताम् ॥
यच्च व्याकुरुषे निरन्तरमिभाः साङ्गाश्चतस्रः श्रुतीः ।
चातुर्यं कथमीदृगित्यपगता शङ्का समस्तापि न
श्चातुर्यं भवतो युजेष्वपि मुखेष्वद्य स्वयं पश्यताम् ॥
विस्तारः
जरायुजाण्डजस्वेदजोद्भिजलक्षणाश्चतुर्विधो भूतग्रामः । चातुर्यं चतुरत्वं चतुष्व(??) च ॥ बृहस्पतिशब्दः छन्दोगश्रुतावेवं व्युत्पादितः - वाग्धि बृहती तस्या एष पतिर्बृहस्पतिः ॥
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कि | च | भू | त | ग्रा | म | मि | मं | च | तु | र्वि | ध | म | हो | नि | र्मा | सि | य | ल्ली | ल | या |
| य | च्च | व्या | कु | रु | षे | नि | र | न्त | र | मि | भाः | सा | ङ्गा | श्च | त | स्रः | श्रु | तीः | ||
| चा | तु | र्यं | क | थ | मी | दृ | गि | त्य | प | ग | ता | श | ङ्का | स | म | स्ता | पि | न | ||
| श्चा | तु | र्यं | भ | व | तो | यु | जे | ष्व | पि | मु | खे | ष्व | द्य | स्व | यं | प | श्य | ताम् | ||
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||||
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