ब्रह्मर्षयोऽपि दनुजेन्द्रसभां प्रविष्टा
मन्त्राक्षराणि मघवादिपदाङ्कितानि ।
ऊहेन दानवपदान्युपवेशयन्तो
हर्षाय पेठुरसुरेन्द्रपुरोहितानाम् ॥
ब्रह्मर्षयोऽपि दनुजेन्द्रसभां प्रविष्टा
मन्त्राक्षराणि मघवादिपदाङ्कितानि ।
ऊहेन दानवपदान्युपवेशयन्तो
हर्षाय पेठुरसुरेन्द्रपुरोहितानाम् ॥
मन्त्राक्षराणि मघवादिपदाङ्कितानि ।
ऊहेन दानवपदान्युपवेशयन्तो
हर्षाय पेठुरसुरेन्द्रपुरोहितानाम् ॥
विस्तारः
ऊहो नाम प्रकृतावन्यथा दृष्टस्य मन्त्रस्य विकृतावन्यथाभावः । प्रथा-प्रकृतावायचरनिर्वापे विनियुक्तस्य 'अग्नये त्वा जुष्टं निर्वपामि' इति मन्त्रस्य विकृतौ सूर्यचरौं 'सूर्याय त्या जुष्ट निर्वपामि' इत्यूह । एवं 'इन्द्राय खाहा वरुणाय स्वाहा प्रजापतये वाहा' इत्यादिमन्त्राणा हिरण्याय वाहा बलये स्वाहा नमुचये वाहा' इत्यादिविपरिणामेन ब्रह्मर्षिभिरूहः कृत ॥
छन्दः
वसन्ततिलका [१४: तभजजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ब्र | ह्म | र्ष | यो | ऽपि | द | नु | जे | न्द्र | स | भां | प्र | वि | ष्टा |
| म | न्त्रा | क्ष | रा | णि | म | घ | वा | दि | प | दा | ङ्कि | ता | नि |
| ऊ | हे | न | दा | न | व | प | दा | न्यु | प | वे | श | य | न्तो |
| ह | र्षा | य | पे | ठु | र | सु | रे | न्द्र | पु | रो | हि | ता | नाम् |
| त | भ | ज | ज | ग | ग | ||||||||
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