संरुन्धन्ति द्विषन्तो नगरमिति समायान्ति रुष्टाः पथीति
प्राकारान्तः प्रविष्टा इति चलति रणो दारुणः संप्रतीति ।
जीवग्राहं गृहीनः सुरपतिरिति च स्वैरमज्ञातमूलाः
सङ्घे सङ्घे प्रजानां नवनवमभवन् भिन्नभिन्नाः प्रवादाः ॥
संरुन्धन्ति द्विषन्तो नगरमिति समायान्ति रुष्टाः पथीति
प्राकारान्तः प्रविष्टा इति चलति रणो दारुणः संप्रतीति ।
जीवग्राहं गृहीनः सुरपतिरिति च स्वैरमज्ञातमूलाः
सङ्घे सङ्घे प्रजानां नवनवमभवन् भिन्नभिन्नाः प्रवादाः ॥
प्राकारान्तः प्रविष्टा इति चलति रणो दारुणः संप्रतीति ।
जीवग्राहं गृहीनः सुरपतिरिति च स्वैरमज्ञातमूलाः
सङ्घे सङ्घे प्रजानां नवनवमभवन् भिन्नभिन्नाः प्रवादाः ॥
विस्तारः
जीवग्राहं गृहीतः । 'ममूलाकृनजीवपु हन्कृञ्ग्रह ' इति णमुल् ॥] तत्क्षणं च युगविगमसमयसंभिद्यमानसप्तार्णवीनिनादशङ्कावहेन कोलाहलेन नागराणामवबुध्य विद्विषामभिषेणनं,[['यत्मेनयाभिगमनमरी तदभिषेणनम्' इत्यमरः
छन्दः
स्रग्धरा [२१: मरभनययय]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ | २० | २१ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सं | रु | न्ध | न्ति | द्वि | ष | न्तो | न | ग | र | मि | ति | स | मा | या | न्ति | रु | ष्टाः | प | थी | ति |
| प्रा | का | रा | न्तः | प्र | वि | ष्टा | इ | ति | च | ल | ति | र | णो | दा | रु | णः | सं | प्र | ती | ति |
| जी | व | ग्रा | हं | गृ | ही | नः | सु | र | प | ति | रि | ति | च | स्वै | र | म | ज्ञा | त | मू | लाः |
| स | ङ्घे | स | ङ्घे | प्र | जा | नां | न | व | न | व | म | भ | व | न्भि | न्न | भि | न्नाः | प्र | वा | दाः |
| म | र | भ | न | य | य | य | ||||||||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.