विधातुं कर्माणि व्यवसितवती यत्पदफला-
न्यसूयान्धा मध्ये श्रुतिरपि किमासीद्भगवती ।
अनुष्ठेयं कर्म स्वयमनभिसंधाय फलमि-
त्ययं वन्ध्यः पन्था यदनुपदमेव प्रकटितः ॥
विधातुं कर्माणि व्यवसितवती यत्पदफला-
न्यसूयान्धा मध्ये श्रुतिरपि किमासीद्भगवती ।
अनुष्ठेयं कर्म स्वयमनभिसंधाय फलमि-
त्ययं वन्ध्यः पन्था यदनुपदमेव प्रकटितः ॥
न्यसूयान्धा मध्ये श्रुतिरपि किमासीद्भगवती ।
अनुष्ठेयं कर्म स्वयमनभिसंधाय फलमि-
त्ययं वन्ध्यः पन्था यदनुपदमेव प्रकटितः ॥
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | धा | तुं | क | र्मा | णि | व्य | व | सि | त | व | ती | य | त्प | द | फ | ला |
| न्य | सू | या | न्धा | म | ध्ये | श्रु | ति | र | पि | कि | मा | सी | द्भ | ग | व | ती |
| अ | नु | ष्ठे | यं | क | र्म | स्व | य | म | न | भि | सं | धा | य | फ | ल | मि |
| त्य | यं | व | न्ध्यः | प | न्था | य | द | नु | प | द | मे | व | प्र | क | टि | तः |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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