दुःखानां क्षतिरित्यबोधहतिरित्यानन्दविष्फूर्तिरि-
त्यन्तर्वाणिविकल्पजालजटिलान्मोक्षादपि ज्यायसी ।
यैषाऽविप्रतिपन्नसौख्यलहरीसंपातसंपादिनी
तत्सौन्दर्यविवेचने कवयतां मौनं क्षमं ह्रीमताम् ॥
दुःखानां क्षतिरित्यबोधहतिरित्यानन्दविष्फूर्तिरि-
त्यन्तर्वाणिविकल्पजालजटिलान्मोक्षादपि ज्यायसी ।
यैषाऽविप्रतिपन्नसौख्यलहरीसंपातसंपादिनी
तत्सौन्दर्यविवेचने कवयतां मौनं क्षमं ह्रीमताम् ॥
त्यन्तर्वाणिविकल्पजालजटिलान्मोक्षादपि ज्यायसी ।
यैषाऽविप्रतिपन्नसौख्यलहरीसंपातसंपादिनी
तत्सौन्दर्यविवेचने कवयतां मौनं क्षमं ह्रीमताम् ॥
विस्तारः
मोक्षविषये बहुधा विप्रतिपतिः शास्त्रेषु प्रथिता । स्वर्ग तु 'गन्न दुःखेन संभिन्नं न च प्रस्तमनन्तरम् । अभिलाषोपनीनं च तत्सुखं स्व पदाम्प दम् ॥' इति सर्वेऽपि तन्त्रकारा ऐककण्ठ्यन प्रत्रवन्ति । अन्तर्वाणिः शास्त्रवित् ॥
छन्दः
शार्दूलविक्रीडितम् [१९: मसजसततग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ | १८ | १९ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दुः | खा | नां | क्ष | ति | रि | त्य | बो | ध | ह | ति | रि | त्या | न | न्द | वि | ष्फू | र्ति | रि |
| त्य | न्त | र्वा | णि | वि | क | ल्प | जा | ल | ज | टि | ला | न्मो | क्षा | द | पि | ज्या | य | सी |
| यै | षा | ऽवि | प्र | ति | प | न्न | सौ | ख्य | ल | ह | री | सं | पा | त | सं | पा | दि | नी |
| त | त्सौ | न्द | र्य | वि | वे | च | ने | क | व | य | तां | मौ | नं | क्ष | मं | ह्री | म | ताम् |
| म | स | ज | स | त | त | ग | ||||||||||||
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