महादेवः सत्रप्रमुखमखविद्यैकचतुरः
सुमित्रा तद्भक्तिप्रणिहितमतिर्यस्य पितरौ ।
मयूखस्तेनासौ सुकविजयदेवेन रचिते
चिरं चन्द्रालोके महति दशसंख्यः सुखयतु ॥
महादेवः सत्रप्रमुखमखविद्यैकचतुरः
सुमित्रा तद्भक्तिप्रणिहितमतिर्यस्य पितरौ ।
मयूखस्तेनासौ सुकविजयदेवेन रचिते
चिरं चन्द्रालोके महति दशसंख्यः सुखयतु ॥
सुमित्रा तद्भक्तिप्रणिहितमतिर्यस्य पितरौ ।
मयूखस्तेनासौ सुकविजयदेवेन रचिते
चिरं चन्द्रालोके महति दशसंख्यः सुखयतु ॥
अन्वयः
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यस्य पितरौ सत्र-प्रमुख-मख-विद्या-एक-चतुरः महादेवः तद्-भक्ति-प्रणिहित-मतिः सुमित्रा च (स्तः) तेन सुकवि-जयदेवेन रचिते महति चन्द्रालोके असौ दश-संख्यः मयूखः चिरम् सुखयतु ।
Summary
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May this tenth chapter of the great Candrāloka, composed by the poet Jayadeva—whose parents are Mahādeva, an expert in sacrificial sessions, and Sumitrā, who was devoted to him—provide lasting delight.
छन्दः
शिखरिणी [१७: यमनसभलग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ | १४ | १५ | १६ | १७ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | हा | दे | वः | स | त्र | प्र | मु | ख | म | ख | वि | द्यै | क | च | तु | रः |
| सु | मि | त्रा | त | द्भ | क्ति | प्र | णि | हि | त | म | ति | र्य | स्य | पि | त | रौ |
| म | यू | ख | स्ते | ना | सौ | सु | क | वि | ज | य | दे | वे | न | र | चि | ते |
| चि | रं | च | न्द्रा | लो | के | म | ह | ति | द | श | सं | ख्यः | सु | ख | य | तु |
| य | म | न | स | भ | ल | ग | ||||||||||
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