प्रतुष्टुवुः कर्म ततः प्रक्ल्््प्तै-
स्ते यज्ञियैर्द्रव्यगणैर्यथावत् ।
दक्षिण्यदिष्टं कृतमार्त्विजीनै-
स्तद्यातुधानैश्चिचिते प्रसर्पत् ॥
प्रतुष्टुवुः कर्म ततः प्रक्ल्््प्तै-
स्ते यज्ञियैर्द्रव्यगणैर्यथावत् ।
दक्षिण्यदिष्टं कृतमार्त्विजीनै-
स्तद्यातुधानैश्चिचिते प्रसर्पत् ॥
स्ते यज्ञियैर्द्रव्यगणैर्यथावत् ।
दक्षिण्यदिष्टं कृतमार्त्विजीनै-
स्तद्यातुधानैश्चिचिते प्रसर्पत् ॥
Karandikar
Thereupon Rama too replied to them : "Nowbegin the desired sacred rite. May the fire of our arrows be enkindled in the faggots in the form of the enemyby the winds of your penance.'
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्र | तु | ष्टु | वुः | क | र्म | त | तः | प्र | क्ल्््प्तै | |
| स्ते | य | ज्ञि | यै | र्द्र | व्य | ग | णै | र्य | था | वत् |
| द | क्षि | ण्य | दि | ष्टं | कृ | त | मा | र्त्वि | जी | नै |
| स्त | द्या | तु | धा | नै | श्चि | चि | ते | प्र | स | र्पत् |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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