आबध्नन्कपिवदनानि संप्रसादं
प्राशंसत्सुरसमितिर्नृपं जिताऽरिम् ।
अन्येषां विगतपरिप्लवा दिगन्ताः
पौलस्त्योऽजुषत शुचं विपन्नबन्धुः ॥
आबध्नन्कपिवदनानि संप्रसादं
प्राशंसत्सुरसमितिर्नृपं जिताऽरिम् ।
अन्येषां विगतपरिप्लवा दिगन्ताः
पौलस्त्योऽजुषत शुचं विपन्नबन्धुः ॥
प्राशंसत्सुरसमितिर्नृपं जिताऽरिम् ।
अन्येषां विगतपरिप्लवा दिगन्ताः
पौलस्त्योऽजुषत शुचं विपन्नबन्धुः ॥
Karandikar
The faces of the monkeys put on great delight; the assembly of gods praised the King who had vanquished the enemy ; to others the ends of the quarters (seemed to) become free of oppression ;Vibhisana , whose brother was dead, entertained grief.
छन्दः
प्रहर्षिणी [१३: मनजरग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | ब | ध्न | न्क | पि | व | द | ना | नि | सं | प्र | सा | दं |
| प्रा | शं | स | त्सु | र | स | मि | ति | र्नृ | पं | जि | ता | ऽरि |
| म | न्ये | षां | वि | ग | त | प | रि | प्ल | वा | दि | ग | न्ताः |
| पौ | ल | स्त्यो | ऽजु | ष | त | शु | चं | वि | प | न्न | ब | न्धुः |
| म | न | ज | र | ग | ||||||||
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