क्रूराः क्रियाः ग्राम्यसुखेषु सङ्गः
पुण्यस्य यः संक्षयहेतुरुक्तः ।
निषेवितोऽसौ भवताऽतिमात्रं
फलत्यवल्गु ध्रुवमेव राजन् ॥
क्रूराः क्रियाः ग्राम्यसुखेषु सङ्गः
पुण्यस्य यः संक्षयहेतुरुक्तः ।
निषेवितोऽसौ भवताऽतिमात्रं
फलत्यवल्गु ध्रुवमेव राजन् ॥
पुण्यस्य यः संक्षयहेतुरुक्तः ।
निषेवितोऽसौ भवताऽतिमात्रं
फलत्यवल्गु ध्रुवमेव राजन् ॥
Karandikar
"Oh King, cruel deeds and addiction to vulgar pleasures which are said to be the cause of complete ruin (and) which have been excessively resorted to by you, will certainly fructify in no charming manner.
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्रू | राः | क्रि | याः | ग्रा | म्य | सु | खे | षु | स | ङ्गः |
| पु | ण्य | स्य | यः | सं | क्ष | य | हे | तु | रु | क्तः |
| नि | षे | वि | तो | ऽसौ | भ | व | ता | ऽति | मा | त्रं |
| फ | ल | त्य | व | ल्गु | ध्रु | व | मे | व | रा | जन् |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.