घोषेण तेन प्रतिलब्धसंज्ञो
निद्राऽऽविलाऽक्षः ष्रुतकार्यसारः ।
स्फुरद्घनः साऽम्बुरिवाऽन्तरीक्षे
वाक्यं ततोऽभाषत कुम्भकर्णः ॥
घोषेण तेन प्रतिलब्धसंज्ञो
निद्राऽऽविलाऽक्षः ष्रुतकार्यसारः ।
स्फुरद्घनः साऽम्बुरिवाऽन्तरीक्षे
वाक्यं ततोऽभाषत कुम्भकर्णः ॥
निद्राऽऽविलाऽक्षः ष्रुतकार्यसारः ।
स्फुरद्घनः साऽम्बुरिवाऽन्तरीक्षे
वाक्यं ततोऽभाषत कुम्भकर्णः ॥
Karandikar
Then Kumbhakarna who had regained wakefulness by that loud voice, whose eyes were turbid with sleep, who had heard the purport of the business, addressed a speech, like a watery cloud thundering in the sky :
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| घो | षे | ण | ते | न | प्र | ति | ल | ब्ध | सं | ज्ञो |
| नि | द्रा | ऽऽवि | ला | ऽक्षः | ष्रु | त | का | र्य | सा | रः |
| स्फु | र | द्घ | नः | सा | ऽम्बु | रि | वा | ऽन्त | री | क्षे |
| वा | क्यं | त | तो | ऽभा | ष | त | कु | म्भ | क | र्णः |
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