त्वया तु लोके जनितो विरागः
प्रकोपितं मण्डलमिन्द्रमुख्यम् ।
रामे तु राजन्विपरीतमेत-
त्पश्यामि तेनाऽभ्यधिकं विपक्षम् ॥
त्वया तु लोके जनितो विरागः
प्रकोपितं मण्डलमिन्द्रमुख्यम् ।
रामे तु राजन्विपरीतमेत-
त्पश्यामि तेनाऽभ्यधिकं विपक्षम् ॥
प्रकोपितं मण्डलमिन्द्रमुख्यम् ।
रामे तु राजन्विपरीतमेत-
त्पश्यामि तेनाऽभ्यधिकं विपक्षम् ॥
Karandikar
However, disaffection has been created in the world by you ; the circle (of kings) led by Indra has been angered; but with Rama, Oh King, this is (just) the opposite ; on that account I apprehend the adversary as superior.
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त्व | या | तु | लो | के | ज | नि | तो | वि | रा | गः |
| प्र | को | पि | तं | म | ण्ड | ल | मि | न्द्र | मु | ख्यम् |
| रा | मे | तु | रा | ज | न्वि | प | री | त | मे | त |
| त्प | श्या | मि | ते | ना | ऽभ्य | धि | कं | वि | प | क्षम् |
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