यदा विगृह्णन्न च संदधानो
वृद्धिं क्षयं चाऽनुगुणं प्रपश्येत् ।
आसीत राजाऽवसरप्रतीक्षस्-
तदा प्रयासं वितथं न कुर्यात् ॥
यदा विगृह्णन्न च संदधानो
वृद्धिं क्षयं चाऽनुगुणं प्रपश्येत् ।
आसीत राजाऽवसरप्रतीक्षस्-
तदा प्रयासं वितथं न कुर्यात् ॥
वृद्धिं क्षयं चाऽनुगुणं प्रपश्येत् ।
आसीत राजाऽवसरप्रतीक्षस्-
तदा प्रयासं वितथं न कुर्यात् ॥
Karandikar
And when a warring king who seeks peace, does not perceive commensurate gain or loss, then, he should keep waiting for a ( suitable ) opportunity ( and ) should not undertake vain efforts.
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | दा | वि | गृ | ह्ण | न्न | च | सं | द | धा | नो |
| वृ | द्धिं | क्ष | यं | चा | ऽनु | गु | णं | प्र | प | श्ये |
| ता | सी | त | रा | जा | ऽव | स | र | प्र | ती | क्ष |
| स्त | दा | प्र | या | सं | वि | त | थं | न | कु | र्यात् |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.