युद्धाय राज्णा सुभृतैर्भवद्भिः
संभावनायाः सदृशं यदुक्तम् ।
तत्प्राणपण्यैर्वचनीयमेव
प्रज्ञा तु मन्त्रेऽधिकृता न शौर्यम् ॥
युद्धाय राज्णा सुभृतैर्भवद्भिः
संभावनायाः सदृशं यदुक्तम् ।
तत्प्राणपण्यैर्वचनीयमेव
प्रज्ञा तु मन्त्रेऽधिकृता न शौर्यम् ॥
संभावनायाः सदृशं यदुक्तम् ।
तत्प्राणपण्यैर्वचनीयमेव
प्रज्ञा तु मन्त्रेऽधिकृता न शौर्यम् ॥
Karandikar
"Whatever , worthy of ( your ) prestige, has been spoken by you, who have been well maintained by the King for
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| यु | द्धा | य | रा | ज्णा | सु | भृ | तै | र्भ | व | द्भिः |
| सं | भा | व | ना | याः | स | दृ | शं | य | दु | क्तम् |
| त | त्प्रा | ण | प | ण्यै | र्व | च | नी | य | मे | व |
| प्र | ज्ञा | तु | म | न्त्रे | ऽधि | कृ | ता | न | शौ | र्यम् |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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