चक्षूंषि कान्तान्यपि साऽञ्जनानि
ताम्बूलरक्तं च सरागमोष्ठम् ।
कुर्वन्सवासं च सुगन्धि वक्त्रं
चक्रे जनः केवलपक्षपातम् ॥
चक्षूंषि कान्तान्यपि साऽञ्जनानि
ताम्बूलरक्तं च सरागमोष्ठम् ।
कुर्वन्सवासं च सुगन्धि वक्त्रं
चक्रे जनः केवलपक्षपातम् ॥
ताम्बूलरक्तं च सरागमोष्ठम् ।
कुर्वन्सवासं च सुगन्धि वक्त्रं
चक्रे जनः केवलपक्षपातम् ॥
Karandikar
(In) making even their charming eyes have collyrium, their (already) colourful lip reddened with betel roll and their fragrant mouth have scent, mere partiality was practised by the womenfolk.
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| च | क्षूं | षि | का | न्ता | न्य | पि | सा | ऽञ्ज | ना | नि |
| ता | म्बू | ल | र | क्तं | च | स | रा | ग | मो | ष्ठम् |
| कु | र्व | न्स | वा | सं | च | सु | ग | न्धि | व | क्त्रं |
| च | क्रे | ज | नः | के | व | ल | प | क्ष | पा | तम् |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.