दुरुत्तरे पङ्क इवाऽन्धकारे
मग्नं जगत्सन्ततरश्मिरज्जुः ।
प्रनष्टमूर्तिप्रविभागमुद्य-
न्प्रत्युज्जहारेव ततो विवस्वान् ॥
दुरुत्तरे पङ्क इवाऽन्धकारे
मग्नं जगत्सन्ततरश्मिरज्जुः ।
प्रनष्टमूर्तिप्रविभागमुद्य-
न्प्रत्युज्जहारेव ततो विवस्वान् ॥
मग्नं जगत्सन्ततरश्मिरज्जुः ।
प्रनष्टमूर्तिप्रविभागमुद्य-
न्प्रत्युज्जहारेव ततो विवस्वान् ॥
Karandikar
The rising sun which had spread the ropes of rays, pulled out the world that had sunk down into the mud-like darkness that was hard to emerge out from and had lost the distinctness of (its) forms.
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| दु | रु | त्त | रे | प | ङ्क | इ | वा | ऽन्ध | का | रे |
| म | ग्नं | ज | ग | त्स | न्त | त | र | श्मि | र | ज्जुः |
| प्र | न | ष्ट | मू | र्ति | प्र | वि | भा | ग | मु | द्य |
| न्प्र | त्यु | ज्ज | हा | रे | व | त | तो | वि | व | स्वान् |
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