कुमुदवनचयेषु कीर्णरश्मिः
क्षततिमिरेशु च दिग्वधूमुखेषु ।
वियति च विललास तद्वदिन्दु-
र्विलसति चन्द्रमसो न यद्वदन्यः ॥
कुमुदवनचयेषु कीर्णरश्मिः
क्षततिमिरेशु च दिग्वधूमुखेषु ।
वियति च विललास तद्वदिन्दु-
र्विलसति चन्द्रमसो न यद्वदन्यः ॥
क्षततिमिरेशु च दिग्वधूमुखेषु ।
वियति च विललास तद्वदिन्दु-
र्विलसति चन्द्रमसो न यद्वदन्यः ॥
Karandikar
The moon who had scattered its rays on beds of night-lotuses and the faces of the ladies, viz., the quarters, where from darkness was annihilated, shone so gracefully in the sky, as none else than moon could shine.
छन्दः
पुष्पिताग्रा []
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कु | मु | द | व | न | च | ये | षु | की | र्ण | र | श्मिः | |
| क्ष | त | ति | मि | रे | शु | च | दि | ग्व | धू | मु | खे | षु |
| वि | य | ति | च | वि | ल | ला | स | त | द्व | दि | न्दु | |
| र्वि | ल | स | ति | च | न्द्र | म | सो | न | य | द्व | द | न्यः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.