वसूनि तोयं घनवद्व्यकारी-
त्सहाऽऽसनं गोत्रभिदाऽध्यवात्सीत् ।
न त्र्यम्बकादन्यमुपास्थिताऽसौ
यशांसि सर्वेषुभृतां निरास्तत् ॥
वसूनि तोयं घनवद्व्यकारी-
त्सहाऽऽसनं गोत्रभिदाऽध्यवात्सीत् ।
न त्र्यम्बकादन्यमुपास्थिताऽसौ
यशांसि सर्वेषुभृतां निरास्तत् ॥
त्सहाऽऽसनं गोत्रभिदाऽध्यवात्सीत् ।
न त्र्यम्बकादन्यमुपास्थिताऽसौ
यशांसि सर्वेषुभृतां निरास्तत् ॥
Karandikar
He distributed riches just as the cloud scatters water, sat with Indra on (his) throne, worshipped none else than Siva and (by his might) destroyed the reputations of all archers.
छन्दः
उपजातिः [११]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व | सू | नि | तो | यं | घ | न | व | द्व्य | का | री |
| त्स | हा | ऽऽस | नं | गो | त्र | भि | दा | ऽध्य | वा | त्सीत् |
| न | त्र्य | म्ब | का | द | न्य | मु | पा | स्थि | ता | ऽसौ |
| य | शां | सि | स | र्वे | षु | भृ | तां | नि | रा | स्तत् |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.